Story of Sushant Singh Rajput- ये खामोशी कौन सुने?

बॉलीवुड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत के अचानक सुसाइड करने के बाद एक टॉपिक जिसने सभी का ध्यान अपनक तरफ खींचा वो है डिप्रेशन।

सुशांत के जाने के बाद हर तरफ लोग इस बारे में बात कर रहे हैं साथ ही उन लोगों के प्रति संवेदनाए दिखा रहे हैं जो खुल कर अपनी बात नहीं रख पाते या किसी तरह के मानसिक तनाव में रहते हैं।

 लेकिन आज सोचने वाली बात ये है कि हम सभी ज़िन्दगी के उस सफर में हैं जहां दुनिया को दिखाने के लिए हसना असल ज़िंदगी में खुश रहने से ज्यादा ज़रूरी है, पर क्या हम कभी सोचते हैं कि डिप्रेशन से जूझ रहे व्यक्ति के जहन में क्या चल रहा होता है। वो हर पल ये सोचता है कि डर के सफर में उसकी खामोशी को कौन सुने, फर्क किसे पड़ता है। दिल में हज़ारों ख्वाइश दफन कर के अगर वो जीता भी है तो ऐसा जीना भी क्या जीना ? एक हज़ार उलझन और दर्द को किस्से साझा करें, किसे बताएं कि दुनिया और खुद से लड़कर कितना टूट चुका है वो , किसपे वक़्त है कि वो सुनना औऱ समझना चाहे की कुछ अनकही तकलीफें उसे कितना खोखला कर रही हैं, वो बेचारा इंसान तो खुल के उफ्फ तक नहीं कर पाता।

एक पुरानी कहावत है “सबसे बड़ा रोग, क्या कहेंगे लोग ” बस इन्हीं चंद लोगों को जवाब ना देना पड़े इसलिए इंसान अंदर अंदर घुटता रहता है और आखिर में वो रास्ता अपना लेता है जिसके बाद उसके परिवार और जानने वालों के पास सिर्फ आंसू और उसकी यादें रह जाती हैं। कितने लोगों ने इस डर से हारकर ज़िंदगी खत्म की, हाँ बाद में समाज को बुरा लगता है और फिर हम उसकी हस्ती हुई तस्वीर को देखकर उसके पीछे के गम को ढूंढने की कोशिश करते हैं, लेकिन हकीकत तो ये है कि कोई इंसान अगर अपना दर्द ज़ाहिर करे तो इसे एक वक्त तक उसके साथ वाले भी उसे सुनते हैं फिर धीरे धीरे बस ये छोड़ के उससे बात करना बंद कर देते हैं कि “अरे यार इसका तो यही काम है, 24 घन्टे रोता ही रहता है”

क्या कभी कोई ये सोचता है कि जो इंसान ऐसा कदम उठा रहा है उसके दिल में कैसी इस टीस हो रही होती है, कितनी बेचैनी कितना दर्द होता है, चाशनी में डूबा हर रिश्ता आखिर  क्यों उसे कितना कड़वा लगता है कि वो उनसे अपना दर्द तक नहीं बांट पाता। शायद वो बस इसी उलझन में रह जाता है कि परिवार, दोस्त, प्यार.. हर रिश्ता आखिर में आकर स्वार्थी क्यों हो जाता है, और सबसे अहम चीज़ की इतनी तकलीफ देने के बाद उन्हें अंदाज़ा भी नहीं होता उनके दर्द का। रिश्तों को इस तरह मरता देख जो घुटन होती है वो शायद ही अल्फ़ाज़ों की मोहताज होगी। दम घुटने लगता है ऐसे रिश्तों में जहाँ आपकी चाह ना हो। ज़िंदगी जीने की उम्र में सिर्फ सांस ले रहे उस शख्स को आखिर में सिर्फ मौत का रास्ता ही समझ आता है।

ऐसे लोगों के साथ प्यार से रहना चाहिए, ताकि वो अपना दर्द आपसे बांटने में हिचकिचाएं नहीं।

किसी को खामोश मत रहने दो, बहुत कुछ कहती हैं ये खामोशियाँ, लेकिन सवाल है कि इतना वक़्त किस के पास है,

बात यही है कि ख़ामोशी सुने कौन? खामोशी कौन सुने?

बॉलीवुड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत के अचानक सुसाइड करने के बाद एक टॉपिक जिसने सभी का ध्यान अपनक तरफ खींचा वो है डिप्रेशन।

सुशांत के जाने के बाद हर तरफ लोग इस बारे में बात कर रहे हैं साथ ही उन लोगों के प्रति संवेदनाए दिखा रहे हैं जो खुल कर अपनी बात नहीं रख पाते या किसी तरह के मानसिक तनाव में रहते हैं।

 लेकिन आज सोचने वाली बात ये है कि हम सभी ज़िन्दगी के उस सफर में हैं जहां दुनिया को दिखाने के लिए हसना असल ज़िंदगी में खुश रहने से ज्यादा ज़रूरी है, पर क्या हम कभी सोचते हैं कि डिप्रेशन से जूझ रहे व्यक्ति के जहन में क्या चल रहा होता है। वो हर पल ये सोचता है कि डर के सफर में उसकी खामोशी को कौन सुने, फर्क किसे पड़ता है। दिल में हज़ारों ख्वाइश दफन कर के अगर वो जीता भी है तो ऐसा जीना भी क्या जीना ? एक हज़ार उलझन और दर्द को किस्से साझा करें, किसे बताएं कि दुनिया और खुद से लड़कर कितना टूट चुका है वो , किसपे वक़्त है कि वो सुनना औऱ समझना चाहे की कुछ अनकही तकलीफें उसे कितना खोखला कर रही हैं, वो बेचारा इंसान तो खुल के उफ्फ तक नहीं कर पाता।

एक पुरानी कहावत है “सबसे बड़ा रोग, क्या कहेंगे लोग ” बस इन्हीं चंद लोगों को जवाब ना देना पड़े इसलिए इंसान अंदर अंदर घुटता रहता है और आखिर में वो रास्ता अपना लेता है जिसके बाद उसके परिवार और जानने वालों के पास सिर्फ आंसू और उसकी यादें रह जाती हैं। कितने लोगों ने इस डर से हारकर ज़िंदगी खत्म की, हाँ बाद में समाज को बुरा लगता है और फिर हम उसकी हस्ती हुई तस्वीर को देखकर उसके पीछे के गम को ढूंढने की कोशिश करते हैं, लेकिन हकीकत तो ये है कि कोई इंसान अगर अपना दर्द ज़ाहिर करे तो इसे एक वक्त तक उसके साथ वाले भी उसे सुनते हैं फिर धीरे धीरे बस ये छोड़ के उससे बात करना बंद कर देते हैं कि “अरे यार इसका तो यही काम है, 24 घन्टे रोता ही रहता है”

क्या कभी कोई ये सोचता है कि जो इंसान ऐसा कदम उठा रहा है उसके दिल में कैसी इस टीस हो रही होती है, कितनी बेचैनी कितना दर्द होता है, चाशनी में डूबा हर रिश्ता आखिर  क्यों उसे कितना कड़वा लगता है कि वो उनसे अपना दर्द तक नहीं बांट पाता। शायद वो बस इसी उलझन में रह जाता है कि परिवार, दोस्त, प्यार.. हर रिश्ता आखिर में आकर स्वार्थी क्यों हो जाता है, और सबसे अहम चीज़ की इतनी तकलीफ देने के बाद उन्हें अंदाज़ा भी नहीं होता उनके दर्द का। रिश्तों को इस तरह मरता देख जो घुटन होती है वो शायद ही अल्फ़ाज़ों की मोहताज होगी। दम घुटने लगता है ऐसे रिश्तों में जहाँ आपकी चाह ना हो। ज़िंदगी जीने की उम्र में सिर्फ सांस ले रहे उस शख्स को आखिर में सिर्फ मौत का रास्ता ही समझ आता है।

ऐसे लोगों के साथ प्यार से रहना चाहिए, ताकि वो अपना दर्द आपसे बांटने में हिचकिचाएं नहीं।

किसी को खामोश मत रहने दो, बहुत कुछ कहती हैं ये खामोशियाँ, लेकिन सवाल है कि इतना वक़्त किस के पास है,

बात यही है कि ख़ामोशी सुने कौन?

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Pratiksha Srivastava

A multi-talented girl possesses a degree in mass communications who is proficient in anchoring and writing content. She has experience of 3 years for working in various news channels like India TV, News 1 India, FM news, and Aastha Channel and her expertise lies in writing for multiple requirements including news, blogs, and articles. Follow@Twitter

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