फिरोज खान विवाद:- शिक्षा को धर्म से जोड़ना कितना सही है

एक भाषा जिसपर हर किसी का अधिकार उसे लेकर विवाद क्यों मचा हुआ है, क्या धर्म और शिक्षा को एक तराजू में रखकर तौल सकते हैं, क्या धर्म शिक्षा से बड़ी होनी चहिए… ये सब सवाल उस वक्त जहन में आए जब धर्म के नाम पर एक व्यक्ति को शिक्षा देने से वंचित करने की बात होने लगी… हम बात कर रहे हैं बीएचयू के प्रोफेसर फिरोज खान की जिन्हें संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान विभाग में नियुक्त किया गया है… और जिनका छात्र बुरी तरह विरोध कर रहे हैं
इस पूरे विवाद को पहले सही तरह से समझते हैं, बीएचयू के प्रोफेसर फिरोज खान की संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान विभाग में नियुक्ति का छात्रों ने जमकर विरोध किया, ये पूरा वक्या सोशल माडिया पर भी खूब छाया, जहां एक तरफ कुछ लोग इन छात्रों को समर्थन दे रहे थे, वहीं कुछ लोग फिरोज खआन के साथ खड़े दिखाई दिए… छात्रों का साफ तौर पर ये कहना था कि हम फिरोज खान का इसलिए विरोध कर रहे थे क्योंकि कोई गैर हिन्दू व्यक्ति कैसे हिंदू धर्म के पूजा पाठ के बारे में बता सकता है. उनका कहना है कि संस्कृत को भाषा के तौर पर किसी भी जाति-धर्म के टीचर द्वारा पढ़ाए जाने पर उन्हें कोई ऐतराज नहीं है.
लेकिन बात फिर वही है कि अगर संस्कृत को भाषा के तौर पर पढ़ाने वाले पर किसी को कोई ऐतराज नहीं तो कोई गैर हिन्दू व्यक्ति हिंदू धर्म के पूजा पाठ के बारे में क्यों नहीं पढ़ा सकता, बशर्ते वो इन्सान वो काबलियत रखता हो…. कुछ लोग इसे इस बात से भी जोड़ते दिखे कि अगर मुस्लिम विश्वविद्यालय में कोई हिन्दू इस तरह से नियुक्त किया तो हम भी तैयार है, क्या तब फिरोज खान की योग्यता बढ़ जाएगी… सोचना होगा कि हमें योग्यता जरूरत है या प्रतिस्पर्धा, शिक्षा को धर्म से जोड़ना कितना सही है
Pratiksha Srivastava
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