नंदीग्राम: जहां से इस बार नहीं खुली ममता बनर्जी की किस्मत, कुछ ऐसा है यहाँ का इतिहास

नंदीग्राम: जहां से इस बार नहीं ममता बनर्जी की किस्मत, कुछ ऐसा है यहाँ का इतिहास


पश्चिम बंगाल में सत्ता के महासंग्राम में एक बार फिर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हैट्रिक मारी है. बीते 10 सालों से काबिज तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने 291 सीटों पर अपने प्रत्याशियों को इस साल विधानसभा चुनाव में उतारा था. लेकिन वो खुद अपने क्षेत्र से इस साल हार गईं, दरसल ममता दीदी अपनी सीट भवानीपुर को छोड़कर इस बार नंदीग्राम से चुनाव में खड़ी हुई थीं. दरअसल नंदीग्राम का नाम राज्य की हाइप्रोफाइल सीटों में आता है. ऐेसे में इस साल मुख्यमंत्री ममता ने भी इसी सीट से लड़ने का ऐलान किया था, लेकिन उनका ये फैसला गलत साबित हुआ.


इस साल ममता के लिए नंदीग्राम से लड़ना इस वजह से भी काफी ज्यादा चर्चाओं में रहा, क्योंकि उनके खास सुवेंदु अधिकारी साल 2016 के विधानसभा चुनाव में इसी सीट से जीते थे. और इस साल भी वो इस सीट पर अपना दबदबा कायम रखने में सफल हुए दरसल टीएमसी छोड़ उन्होंने बीजेपी का दामन थामन लिया था. नंदीग्राम विधानसभा सीट पूर्वी मेदिनीपुर जिले में पड़ती है. जहां अधिकारी परिवार का दबदबा माना जाता. ऐसे में ममता का अधिकारी परिवार के गढ़ में उतरना हर किसी के लिए हैरान करने वाला निर्णय था.


साल 2016 के विधानसभा चुनाव में सुवेंदु अधिकारी ने इस सीट पर CPI के अब्दुल कबीर शेख को 81 हजार 230 वोटों से करारी शिकस्त दी थी. उस वक्त सुवेंदु को यहां कुल 1 लाख 34 हजार 623 वोट मिले थे.


नंदीग्राम के अब तक के चुनानी समीकरण क्या गवाही देते रहे हैं


दरअसल नंदीग्राम एक ऐसा विधानसभा एरिया है, जहां पर 70 प्रतिशत हिंदु बसते हैं. बाकि यहां पर मुस्लिमों की आबादी रहती है. हर बार यहां के विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोटरों की खास भूमिका रही है. नंदीग्राम सीट पर बीते तीन चुनावों के नतीजे पर ध्यान दिया जाए तो साल 2006 में पहले और दूसरे नंबर पर रहने वाले दोनों ही प्रत्याशी मुसलमान थे. इसके बाद साल 2011 में भी यहां मुस्लिम उम्मीदवार ने ही जीत हासिल की थी. यहां पर इस जीत-हार का अंतर 26 प्रतिशत था. तो वहां साल 2016 में यहां सुवेंदु जीते थे, लेकिन अंतर केवल 7 प्रतिशत था.


एक रिपोर्ट की माने तो नंदीग्राम में 53 प्रतिशत महिष्य समुदाय के लोग रहते हैं. इस जाति के लोग खास तौर पर खेती-किसानी करते हैं. ऐसा भी कहा जाता है कि, नंदीग्राम के आंदोलन की सफलता का कारण भी इसी समुदाय के लोग थे. इसी समुदाय पर कहीं न कहीं बीजेपी की भी नजरें थीं, जो सफल नहीं हो पाई और राजनीतिक पंडितों ने पहले ही नंदीग्राम सीट पर दलित मतदाताओं के वोट अहम बताया था. ममता और सुवेंदु के लिए यह प्रतिष्ठा की लड़ाई बन चुकी थी. आखिरकार इस चुनाव में फिर से मुख्यमंत्री ने शानदार हैट्रिक लगाते हुए नंदीग्राम विधानसभा चुनाव क्षेत्र से अंतिम राउंड की काउंटिंग 1200 मतों से जीत हासिल कर ली है.


नंदीग्राम विधानसभा सीट का ऐसा रह चुका है इतिहास


साल 2016 में इस सीट से तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर सुवेंदु अधिकारी जीते थे.
साल 2011 में नंदीग्राम सीट से फिरोजा बीबी ने टीएमसी की टिकट पर 61.21 प्रतिशत वोट से जीत हासिल की थी.
साल 2009 के उपचुनाव में इस सीट पर टीएमसी की फिरोजा बीबी विजयी हुईं.
2006 के विधानसभा चुनाव में इस सीट पर भाकपा के इलियास मोहम्मद ने जीत हासिल की थी.
1996 के विधानसभा चुनाव में इस सीट पर कांग्रेस के देबिशंकर पांडा जीते थे.
1967 से 1972 तक भाकपा के भूपल चंद्र पांडा इस सीट से कई बार चुनाव जीते.

दरअसल नंदीग्राम अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्र माना जात है. कहते हैं कि इस सीट से खड़े होने वाले उम्मीदवारों की किस्मत का भी निर्णय अल्पसंख्यक मतदाता के ही हाथ में होता है. यह बड़ा कारण रहा कि, ममता बनर्जी ने इस सीट से चुनाव लड़ने का फैसला किया था. गौरतलब है कि, वाममोर्चा के शासन को जड़ से उखाड़ फेंकने में नंदीग्राम आंदोलन की खास अयादगी रही है. बीते 10 साल की राजनीति में नंदीग्राम आंदोलन को हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हुए सीएम ममता बनर्जी ने विपक्षियों को धूल चटाई है. इस साल भी ममता बनर्जी ने चुनाव में जीत हासिल करते हुए बीजेपी को चारो खाने चित कर दिया है.

Shilpi Sharma

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